KODHYAR MAA CHAND



।। मातृ चरणार्विन्दोश्रित मम: ।।

                         ।। दोहा ।।
किनियाँणी तुज कारणै, व्हालौ जगत विशैष ।
हाथ जौड़ हाजिर रहा, हरसित चरण हमेश ।

धिन धणियप धिनियांण रो,हैत भर्या धिन हाथ।
खौट बिसर मन मौट सूं, सबविथ करै सनात ।

भक्ति भाव जाणू नही, नहि जाणूं नित नैम ।
ओ जाणू मैं आपरौ, (हूँ) बाळकियौ बैभैम ।

       विनीत:- जयसिंह सिढ़ायच मण्डा 
                         राजसमन्द

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